छत्तीसगढ़ के समकालीन कवियों के काव्य में चेतना का स्वरूप

 

शैलेन्द्र कुमार ठाकुर

सहायक प्राध्यापक, हिन्दी, डॉ. खू... शास. स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भिलाई-3,

जिला-दुर्ग, छत्तीसगढ।

*Corresponding Author E-mail:

 

ABSTRACT:

सहितस्य साहित्य की बातें साहित्यकारों ने की है। साहित्य को समझने बूूझने की वास्तविक शक्ति मनुष्य की ही होती है। क्योंकि मनुष्य के पास भाषा है, अभिव्यक्ति के लिए चिन्तनीय अवस्था है, साधन है प्रेस है। उसके पास अभिव्यक्ति की आजादी है। यह पशु या अन्य जीवो में नहीं है। साहित्य का मानव जीवन से घनिष्ट संबंध है। साहित्य में ही मानवीय मूल्यों के साथ ही उसकी संवेदनाओं के बारे में अभिव्यक्ति मिलती है। भारतीय काव्य साहित्य कविता को आनंद सच्चिदानंद प्राप्ति का एक समग्र साधन माना जाता है। जाबकि पाश्चात्य दर्शन में इसे त्रासदी माना गया है। भारतीय साहित्य में काव्य को अत्यधिक महत्व दिया गया है। कविता के माध्यम से आद्यकवि वाल्मीकि ने अपनी मनोभावनाओं को अभिव्यक्त किया है।

 

KEYWORDS: भारतीय काव्य साहित्य, भारतीय साहित्य में काव्य।

 


 


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हिन्दी साहित्य में प्रयोगवाद, प्रगतिवाद, के बाद 1960 के दशक से ही समकालीन कविता का आगाज हो गया था। वैसे इसकी गूॅज हमें कबीर तुलसी निराला नागार्जुन मुक्तिबोध की रचनाओं में स्पष्टतः देखने को मिलती है। 1960 के दशक के बाद अधिकतर जनवादी लेखकों एवं कवियों ने अपनी रचनाओं में समाज के प्रति जो चिंता व्यक्त की है जिसमें शोषणवादी मनोभावना का विशेषरूप से विरोध दिखाई देता है। डॉ. हुकुमचंद गजपाल इस संदर्भ में कहते हैं कि समकालीन का संबंध काल विशेष के वैयक्तिक, सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक सामाजिक स्थिति के वर्तमान से रहा है। इस कारण इसे कन्टेम्परेरी के पर्याय रूप में समझा जाता है।1

 

समकालीनता के संदर्भ में डॉ. शिवप्रसाद सिंह ने जो मत दिया है वह समीचीन लगता है। वे लिखते है। कि समसामयिकता कलेवर की चीज है, आधुनिकता समसामयिक बिखराव और उथल-पुथल के बीच निरंतर गतिशील चेतना को समझने का दृष्टिकोण है। यहॉं समसामयिकता और आधुनिकता अलग-अलग है। इसलिए समसामयिकता मान लेना जोखिम है।2

 

श्रीपद राय के अनुसार समसामयिकता और आधुनिकता में जो अंतर है वह केवल समय का ही नहीं अन्तरदृष्टि का भी है। कदाचित रचना विधान का भी है।3

 

डॉ. परमानंद श्रीवास्तव जो कि समकालीन साहित्य के अच्छे जानकार भी है। वे लिखते हैं कि गहरे ऐतिहासिक मोहभंग के परिणामस्वरूप आज की समकालीनता एक सर्वथा नई मूल्यवत्ता का संदर्भ पा सकी है। जो हमें मानव अस्तित्व की कठोर गतिविधियों या कर्म या राजनीति में हिस्सा लेने को बाध्य करती है। समकालीनता सिर्फ मुहावरा नहीं है। बल्कि आज की संश्लिष्ट वास्तविता में प्रवेश करने का संकल्प या प्रतिबद्ध जीवन दृष्टि है। तीखे मोहभंग की परिणतिस्वरूप सौन्दर्याभिरूचि से स्थिर की हुई भाषा समकालीन मानव स्थिति के लिए व्यर्थ या अनुपयोगी सिद्ध हो गयी है।4

 

समकालीन साहित्य केवल नया या आधुनिक ही नहीं वह उस काल का पुरातन भी माना जाना चाहिए। संत कबीर, नानक, तुलसी भक्तिकाल के विश्व जनभावना के अनुकूल लेखकों एवं कवियों ने जिस चिंतनधारा का नाम दिया है उसे समकालीन काव्यधारा के रूप में जाना जाता है। बहुतायत लेखक नया पुराना चिंतन के बीच अपने-अपने विचारों की लड़ाई लड़ने में रूचि रखते हैं। लेकिन मैनेजर पाण्डेय इसे अपने दृष्टिकोण से देखते हुए लिखते है। कि - केवल नया ही समकालीन नही होता बल्कि जो सार्थक है वही समकालीन है चाहे वह पुराना ही क्यों हो।5

 

वास्तव में समकालीन शब्द की तथ्यगत व्याख्या बहुतायत कवि एवं आलोचकों ने अपने-अपने तरीके से की है। विश्वम्भर नाथ उपाध्याय के अनुसार-”कुछ विद्धान समकालीनता को आधुनिकता समझ बैठते हैं। मूल्यों को समकालीन बनाये रखना आधुनिकता है। जो कल मनुष्य तात्कालिक संदर्भ मक सीमित रह जाते हैं वे समकालीन तो होते हैं आधुनिक नहीं।6

 

वास्तविक रूप से देखा जाय तो समकालीन भाव बोध से भरा व्यक्ति देशकाल की परिस्थिति के साथ ही सामाजिक सांस्कृतिक चिंतनधारा से पूर्णतः ज्ञात रहता है, जिस कारण उसकी कविता में शोषणवादी, चिंतनधारा के खिलाफ विद्रोह की स्थिति दिखाई देती है। देखा जाय तो कविता का काम कालानुसार जनमानस को जागृत करना होता है जो कवि अपने समय के प्रति सचेत या जागरूक होता है। वही समाज को नई दिशा दिखा सकता है। वह अतीत या बीते हुए समय से सीख लेते हुए वर्तमान एवं भविष्य को सचेत करता है। कविता केवल आनंद ही नहीं देती बल्कि वह हमें जागरूक जागृत आदमी बनने की पूर्ण सीख भी देती है।

 

संत कबीर, तुलसी, निराला भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जैसे महान कवि अपने समय के अनुसार आधुनिक एवं समकालीन है। क्योंकि उन्होंने भारतीय जनमानस की चिंतनीय धारा को चेताने का काम किया है। वास्तविक तौर पर देखा जाय तो कवि की कविता केवल शब्दों एवं भावों के रूप में ही व्यक्त नहीं होती। वह युगबोध एवं युगीन चेतना को प्रभावित करती है। समय की धड़कन या समय ही नब्ज को पकड़ने वाला कवि या लेखक ही आधुनिक या समकालीन होता है। समकालीन कविताओं में समय के यथार्थरूप को जीवन मूल्यों को मानवीय मूल्यों को भाषा एवं शिल्पों के माध्यम से एक स्वरूप प्रदान करते हैं। रेखाचित्र खींचते हैं। वास्तव में एक चित्रकार शब्द ब्रम्ह का ज्ञाता है एवं कालजयी उदघोषक होता है।

 

समकालीन बोध से परिपूरित जितनी भी कवितायें हैं वह अपने समय के समाज को जगाने वाली थी और वह सत्ता के शीर्ष पर बैठे शोषकों से संघर्ष करने वाली थी। देखा जाय तो कबीर ने स्पष्टतः यह घोषणा की थी कि -

कबीरा खड़ा बाजार में लिया लुकाठी हाथ

जो घर जारे आपना चलै हमारे साथ।7

 

कबीर का उदघोष शाश्वत है, सत्य है। वे आम आदमी के साथ खड़े होते हैं और उन शोषकों की खिलाफत करते हैं।

 

समकालीन हिन्दी साहित्य के विकास की यात्रा, सरहप्पा, गोरखनाथ से लेकर तुलसीदास, कबीरदास, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, निराला, मुक्तिबोध, अज्ञेय, नागार्जुन, रघुवीर सहाय, धूमिल, विनोद कुमार शुक्ल, एकांत श्रीवास्तव, विनोद शर्मा, शिव शैलेन्द्र, वंदना कंगरानी जैसे कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय समाज को सचेत करने का काम किया। ऋतुराज ने अपनी रचनाओं के माध्यम से कवियों के बारे में लिखते हैं कि -

कवि लोग बहुत लम्बी उमर जीते है।

मारे जा रहे होते हैं

फिर भी जीते हैं

कृतघ्न समयों में भूखों और लपटों के साथ

निभाते दोस्ती

उनके हाथों में ठूसते अपनी किताब

कवि लोग बहुत दिनों तक हंसते है।

चीखते हैं और चुप रहते हैं

लेकिन मरते नहीं कमबख्त।8

 

मुक्तिबोध की रचनायें समाज की सच्चाई को बड़ी ही बारीकी के साथ अभिव्यक्त करते है। इनकी रचनाये ज्ञानात्मक रचनाओं को संवेदना जगाने वाली है।

किस तरह से आग भभकेगी

उड़ेगी किस तरह से भक से

हमारे वक्ष पर लेटी हुई

विकराल चट्टानें।9

 

समकालीन कवियों में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इन्होंने अपने समय के सामाजिक यथार्थ को बड़े ही सटीक ढ़ंग से वर्णित किया है। वे लिखते है। कि -

धीरे-धीरे एक क्रान्ति यात्रा

शव यात्रा में बदल रही है

सडांध फैल रही है

नक्शे पर देश के।10

 

समाज में हो रहे शोषण और उत्पीड़न के बावजूद क्रान्ति के होने से कवि निराश है। जनकवि नागार्जुन ने समकालीन अर्थतंत्र, राजतंत्र सामाजिक ताने बाने को तार-तार करते हुए यथार्थ को चित्रित किया है। नागार्जुन लिखते है कि -

श्वेत श्याम रतनार अॅंखिया निहार के

सिण्डी केटी प्रभुओं की

पगधूर झार के

दिल्ली से लौटे हैं कल टिकट मार के

खिल्ले हैं दॉंत ज्यों दाने अनार के

आये दिन बहार के।11

 

भ्रष्टाचारी नेता अफसर एवं उनके दलालों पर नागार्जुन सटीक व्यग्य करते है।

लीलाधर जगुड़ी ने समाज में व्याप्त उपभोक्तावादी संस्कृति बाजारवाद एवं प्रायोजित विज्ञापनों पर प्रहार करते हुए लिखते हैं कि -

जो है उसे बेचते जाओ,

नया खरीदों का पाठ पढ़ाया जा रहा है

नया वाहन जरूरी वाहन बताया जा रहा है

जिसके लिए दिखाए गए हैं

कुछ अपारिवारिक स्त्रियों के विशिष्ट वक्ष

कोई नहीं बताता कि

धरती के कितने थन सूख गया हैं।12

 

आज का कवि समसामयिक वर्तमान समय को भयावह विसंगत दिखाते हुए सामाजिक त्रासदी को भी चित्रित करता है। आज की कविता बाजारवाद, छद्मवाजाखाद एवं उससे उत्पन्न विसंगति से भी प्रभावित होती है। बाजारवाद में प्रलोभन है आकर्षण है कामात्मक संतुष्टि है। आज के नेता चेहरे पर एक चेहरा लगाकर घूम रहे हैं। उनके भीतर की धूर्तता साफ दिखाई देती है। जनता सब कुछ समझती है फिर भी चुप है। इस तरह से देखा जाय तो आज की समकालीन कविता समाज में व्याप्त विसंगति के साथ ही उसकी वास्तविकता की गॉंठ खांेलती है। समकालीन कवियों के पुरोधा धूमिल लिखते हैं कि -

सिर्फ एक शोर है

जिसमें कानों के पर्दें फटे जा रहे हैं

शासन, सुरक्षा, रोजगार, शिक्षा

राष्ट्रधर्म, देशहित आजादी वीसा

वाद विरादरी, भूख भीख भाषा

शान्ति, क्रांन्ति शीतयुद्ध एटमबम सीमा

एकता सीढ़ियॉं साहित्यिक

पीढ़ियॉ निराशा

झॉप-झॉप खाय खाय

हाय-हाय, सॉंय, सॉंय

मैंने देखा हर तरफ रंग बिरंगे झण्डे फहरा रहे हैं।

गिरगिट की तरफ रंग बदलते हुए गुट से गुट टकरा रहे हैं।

वे एक दूसरे से दॉता किलकिला रहे हैं।

वे एक दूसरे को दूर कर विल-विल विलविला रहे हैं।13

 

हिन्दी साहित्य के प्रतिष्ठित साहित्यकार जय प्रकाश मानस ने धर्म एवं मानवीय मूल्यों के जीवंतता को संकेतित करते हुए लिखा है कि -

तुमने हमारे मंदिर ढ़हाये

हमने तुम्हारे मस्जिद

शायद तुम  अंधे हो गए थे और हम भी

चलो गलतियॉं दोनों से हुई इंसान थे

पर यह तो बुझे आखिर क्यों

तुम्हारे पैगम्बर ने

हमें राम ने समझाया ।।14

समकालीन काव्यधारा के शसक्त हस्ताक्षर वसंत त्रिपाठी ने लिखा है कि

मनुष्य होना पृथ्वी पर होने की सजा नहीं है

यह बात मैंने किसी और से नहीं कहीं अपने से कई कई बार कही

और मनुय होने की सजा सही कई-कई बार सही।।15

 

हिन्दी साहित्य के कवि जो छत्तीगढ़िया संस्कृति और उसके आवोहवा में ढ़ल गये कवि शिव शैलेन्द्र ने लिखा है कि -

सच का सामना कठिन होता है साथी

जब तक तुम झूठे सामाजिक ताने-बाने में जीओगे

तब तक तुम अपनी अन्तरात्मा को छलोगे।

तुम्हें निकलता होगा उस झूठे कैनवास से

जहॉं सदियों से आदमी को

जाति पाति वर्ण के तमगों से ठगा गया है।16

 

शिव शैलेन्द्र ने नया विहान में मजदूर एवं किसानों को जगाते हुए चेताया है कि आपको अपने एवं अपने समाज के लिए जगना होगा। वे लिखते हं कि -

शोषकों के खिलाफ

लम्बी लड़ाई लड़ने के लिए

किसान मजदूरों की एकता जरूरी है

जब तक पीड़ित समाज

अपने हम के लिए नहीं उठेगा

तब तक चाटते रहेंगे  तलुवा नेताओं के

चंद दानों के लिए

बिकने वाले लोग सौंप देते हैं

अपने किस्मत की संपदा।17

 

एकांत श्रीवास्तव हिन्दी के कवियों खासकर छत्तीसढ़ के समकालीन कवियों में अपना विशिष्ट स्थान रखता है।

 

सुनो जो सुनाई दे रहा। बस एक बार अपनी सारी कार्यवाहियॉ स्थगित करके। सुनो अपनी आत्मा को जो सदियों से तुमसे कुछ कहना चाहता है। वे पॅंूजीवादी व्यवस्था पर व्यंग्य करते हुए लिखते हैं कि -

पैसा पाओ मगर वहॉं मत जाओ

जहॉं दृश्य में बदलने को तैयार है

एक चित्रकार के रंग

वहॉं नहीं जहॉं पकते धान की

खुशबू से भरे हैं शब्द

और लिखी जाने वाली है एक कविता

वहॉं नहीं जहॉं बासुरी से। उठने वाली एक धुन।

वहॉं नहीं जहॉं सीने में धड़क रहा है एक दिल।18

 

छत्तीसगढ़ के युवा कवियों में विनोद शर्मा एक अलग पहचान लेकर उभरे है। उनकी कविताओं में आज के युगीन संदर्भ, सामाजिक चेतना, सामाजिक संघर्ष एवं आम आदमी की स्वभाविक चिंता दिखाई देती है। धरती कभी बॉझ नहीं होती में लिखते हैं कि -

धरती अपने विचारों में उर्वर होती है

सोखती है सूरज की किरणें

चॉंद की शीतलता

तारों की भटकन और आकाश का सूनापन

धरती में समाया होता है धैर्य

आदमी के ढ़ेर सारे विखरते सपने और

अथाह पानी जो ऑंखों से बह सके

और रच सके आदमी19

 

विनोद शर्मा ने अपनी रचना के माध्यम से समकालीन भाव बोध को दर्शाते हुए लिखा है कि -

माटी के पहाड़ों से गुजरते हुए

मैंने पहली बार जाना कि

जमीन ही जड़ों को नहीं बॉधती है

जड़ें भी जमीन को बॉंधती है।20

 

समकालीन कविता के संदर्भ में विचार किया जाय तो यह निष्कर्ष निकलता है कि - समाज के भीतर होने वाले परिवर्तनों के चरितार्थ होने की प्रक्रिया में रचनाकार दोहरी भूमिका का निर्वाह करता है। एक ओर वह रचना में समाज की आशाओं आकांक्षाओं को सृजनात्मक रूप प्रदान करते हुए सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया को उत्प्रेरित करता है वहीं दूसरी ओर वह अपने समय समाज के वास्तविक अनुभवों को इतिहास के समूचे प्रवाह में अपनी रचनाओं के माध्यम से अवस्थित करने का प्रयत्न करता है। समकालीन कविता की विभिन्न प्रवृतियों और अन्तर्धाराओं को ध्यान में रखते हुए यदि विचार करें तो यह समझना मुश्किल नहीं है कि समकालीन कविता, विशेष रूप से स्त्रीवादी कविता, मानवतावादी, भ्रष्टाचार विरोधी एवं शोषणवादी विचारधाराओं का विरोध देखने को मिलता है। समकालीन कविता में कवियों ने भारतीय समाज के साथ ही विश्व जनमानस की आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक एवं सांस्कृतिक समस्यों को भी केन्द्र में रखकर साहित्य का सृजन किया है। कविता को लिखना केवल कवियों का मनोविनोद ही नहीं है वाल्मीकि, कबीर, तुलसी, निराला, नागार्जुन, शमशेर, मुक्तिबोध, धूमिल, विनोद कुमार शुक्ल के साथ ही केदारनाथ सिंह एवं आज के युवा कवियों में एकान्त श्रीवास्तव, विनोद शर्मा, शिव शैलेन्द्र, वंदना कंगरानी, अल्पना त्रिपाठी जैसे युवा कवियों ने समकालीन कविता को एक नया आयाम दिया है। वास्तव में कविता शोरगुल के बीच से हटकर एकांत के बीच तनाव से दूर मानवीय मूल्यों के लिए समर्पित होती है। कवि की कविता जीवन मूल्यों के साथ ही सौन्दर्य बोध को भी विकसित करती है। जिस कवि में मानवीय मूल्यों के साथ ही सौन्दर्य बोध को भी विकसित करती है। जिस कवि में मानवीय चेतना के साथ ही सौंदर्यबोध की जितनी अच्छी सोच या समझ होगी वह कवि उतना ही सिद्ध होगा। उसकी वाणी का शब्दों का विम्बो एवं रूपक का चयन भी उतना ही त्रुटिमुक्त होगा। सुप्रसिद्ध चिंतक मानसी से ठीक ही कहा है कि-”कलाकार के सम्मुख एक परिदृश्य अवश्य होनी चाहिए किन्तु राजनीतिज्ञ की अपेक्षा उसका परिदृश्य अनिवार्यतः कम नपा तुला और कम निर्दिष्ट होता है और इस तरह कम कट्टर होता है23

 

निष्कर्ष:-

समकालीन कविता में कवियों ने जिस तरह से समाज में घटित उन तमाम घटनाओं को वर्णित किया है। वह चाहे सामाजिक तौर पर शोषण का हो, भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार, आतंकवाद, दलितों की समस्या स्त्रियों के प्रति प्रेम और उनके प्रति समाज के लोगों के दृष्टिकोण को दर्शाती है। आज की समकालीन कविता में जीवन दर्शन के साथ ही जीवन की तमाम दार्शनिक दयनीयता मनोवैज्ञानिक खीझ जैसी भाव वृत्तियॉं भी देखने को मिलती है। समकालीन कविता में अपने समय के समाज और देश की सम्पूर्ण धड़कन इस समय की कविता में उपस्थित है। इस हेतुु कवियों के पास अभिव्यक्ति के औजार भी है। जो लोकभाषा, लोक जीवन लोकगीतों लोकनृत्यों में स्पष्टतः दिखाई देते हैं। समकालीन कवियों की रचना समय की धड़कन के साथ अभिव्यक्त होती है। वह शब्दबेधी बाण की तरह सार्थक और सकारात्मक प्रहार भी करती है। आज की कविता में सृजनात्मक भावों को विशेष प्रभाव देखने को मिलता है। वह प्रकृति में होने वाले छोटे-छोटे महत्वहीन समझे जाने वाले क्रिया व्यापारों को सामने लोकर अपनी रचनात्मक दृष्टि का भी परिचय देते हैं। समकालीन रचनाकार अपनी रचना के माध्यम से समाज को नयी दिशा देने के लिए प्रतिबद्ध है जो उनकी रचनाओं में दिखाई देता है।

 

सन्दर्भ सूची:-

1-     राजपाल हुकुमचंद (संपादक) समकालीन बोध और धूमिल का काव्य

2-     सिंह शिश्वप्रसाद कल्पना नवलेखन विशेषांक संपादकीय अगस्त-सितम्बर 1969

3-     राय श्रीपद विकल्प कथा साहित्य विशेषांक समकालीन कहानी में नयी संवेदना

4-     श्रीवास्तव परमानंद कल्पना पत्रिका, पृ. क्र. 14

5-     मैनेजर पाण्डेय अनमैंसॉंचा पृ. क्र. 2

6-     उपाध्याय विश्वम्भरनाथ उपाध्याय - समकालीन सिद्धांत और साहित्य पृ. क्र. 14

7-     कबीर साखी सं. जयदेव सिंह पृ. क्र. 80

8-     पहल 37, सं. ज्ञानरंजन पृ. क्र. 30

9-     मुक्तिबोध। चॉंद का मुॅह टेढ़ा है। अंधेरे में कविता पृ. क्र. 151

10-   प्रतिनिधि कविताएॅं, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, 11, पृ. क्र. 146

11-   डॉ. तिवारी विश्वनाथ प्रसाद समकालीन हिन्दी कविता पृ. क्र. 62

12-   जुगाड़ी लीलाधर, अपनी भयश्री शक्ति देता हैै पृ. क्र. 18

13-   डॉ. तिवारी विश्वनाथ प्रसाद समकालीन हिन्दी कविता राज कमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण 1982 पृ. क्र. 199

14-   जप्रकाश मानस, छत्तीसगढ़ के कवि विभा प्रकाशन पृ. क्र. 75

15-   बसंत त्रिपाठी, छत्तीसगढ़ के कवि विभा प्रकाशन पृ. क्र. 118 

16-   शिव शैलेन्द्र, समर शेष है साथी, वैभव प्रकाशन कविता सच का सूरज पृ. क्र. 41

17-   शिव शैलेन्द्र कविता - नया विहान समर शेष है साथ पृ. क्र. 52 वैभव प्रकाशन

18-   अल्पना त्रिपाठी फेस बुक (छत्तीसगढ़ के युवा कवियों समकालीन काव्य का स्वरूप) रिसर्च जनरल ऑफ आटर््स 2021 मार्च पृ. क्र. 91

19-   श्री रंग, छत्तीसगढ़ के समकालीन कवि इलाहाबाद द्वितीय संस्करण एकान्त श्रीवास्तव पृ0 47

20-   शर्मा विनोद - धरती कभी बॉंझ नहीं होती पृ. क्र. 64

21-   वही (धरती कभी बॉझ नहीं होती) अरूणाचल में पृ. क्र. 44

 

 

 

Received on 08.03.2024         Modified on 30.03.2024

Accepted on 18.04.2024         © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences. 2024; 12(1):30-36.

DOI: 10.52711/2454-2679.2024.00007